धार्मिक नगरी हरिद्वार में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें आतंकवाद, टेरर फंडिंग और अंतरराज्यीय नशा तस्करी जैसे संगीन अपराधों से जुड़े आरोपियों को बाहरी एजेंसियों या दूसरे राज्यों की पुलिस ने गिरफ्तार किया, जबकि स्थानीय पुलिस को इसकी पूर्व जानकारी तक नहीं थी। इन घटनाओं ने हरिद्वार पुलिस के खुफिया तंत्र, मुखबिर नेटवर्क और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।
हरिद्वार उत्तराखंड का सबसे संवेदनशील जिलों में गिना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इसके अलावा यहां औद्योगिक क्षेत्र, पर्यटन गतिविधियां और समय-समय पर होने वाले बड़े धार्मिक आयोजन सुरक्षा के लिहाज से इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाते हैं। ऐसे जिले में यदि आतंकवाद या संगठित अपराध से जुड़े संदिग्ध लंबे समय तक सक्रिय रहें और स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी न हो, तो यह चिंता का विषय माना जा रहा है।
आतंकवाद से जुड़े मामलों में पहले भी हो चुकी है किरकिरी
वर्ष 2016 में अर्धकुंभ मेले के दौरान एक बड़ा मामला सामने आया था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हरिद्वार क्षेत्र से आतंकी गतिविधियों से जुड़े तीन संदिग्ध युवकों को हिरासत में लिया था। बताया गया कि ये युवक एक बड़े आतंकी षड्यंत्र से जुड़े हुए थे। कार्रवाई इतनी गोपनीय थी कि स्थानीय पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। मामला सार्वजनिक होने के बाद हरिद्वार पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे और पुलिस को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था।
इससे पहले जनवरी 2010 में भी इसी प्रकार की कार्रवाई हुई थी, जब बाहरी एजेंसियों ने जिले में छापेमारी कर संदिग्धों को पकड़ा था। उस समय भी स्थानीय पुलिस की भूमिका को लेकर प्रश्न उठे थे।
नशा तस्करी के मामलों में भी सामने आई कमियां
हरिद्वार और रुड़की क्षेत्र लंबे समय से नशा तस्करों के लिए ट्रांजिट रूट के रूप में भी चर्चा में रहे हैं। कई बार पंजाब पुलिस, दिल्ली पुलिस और अन्य राज्यों की एजेंसियों ने यहां आकर नशा तस्करी से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इन मामलों में भी स्थानीय पुलिस अक्सर कार्रवाई के बाद ही सक्रिय दिखाई दी। आलोचकों का कहना है कि यदि मुखबिर तंत्र मजबूत होता तो इन अपराधियों की गतिविधियों की जानकारी पहले ही मिल सकती थी।
टेरर फंडिंग और आतंकी कनेक्शन के मामलों ने बढ़ाई चिंता
हाल ही में पिरान कलियर क्षेत्र के आसफनगर गांव से टेरर फंडिंग से जुड़े एक मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सोनम नामक युवती को हिरासत में लिया था। जांच में युवती के कथित तौर पर पाकिस्तानी हैंडलर से संपर्क होने की बात सामने आई थी। इस कार्रवाई ने भी स्थानीय पुलिस के सूचना तंत्र को लेकर कई सवाल खड़े किए।
वहीं, रुड़की के ढंडेरा निवासी मुर्सरफ को सहारनपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। जांच में उसके आतंकी संगठन से संबंध होने की आशंका जताई गई थी। सबसे हैरानी की बात यह रही कि वर्षों से ढंडेरा में रहने वाले इस युवक की गतिविधियों की जानकारी स्थानीय पुलिस को नहीं थी। मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था।
मुखबिर तंत्र और स्थानीय निगरानी पर उठ रहे सवाल
पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसका खुफिया नेटवर्क और मुखबिर तंत्र माना जाता है। स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाना, अपराधियों की निगरानी करना और समय रहते कार्रवाई करना पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है। लेकिन जब बार-बार बाहरी एजेंसियां जिले में आकर बड़ी कार्रवाई करती हैं और स्थानीय पुलिस को बाद में जानकारी मिलती है, तो यह व्यवस्था की कमजोरी की ओर इशारा करता है।
जनता के बीच भी हो रही चर्चा
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों के बाद आम लोगों के बीच भी पुलिस की कार्यक्षमता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोगों का मानना है कि हरिद्वार जैसे संवेदनशील जिले में खुफिया तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि आतंकवाद, टेरर फंडिंग, नशा तस्करी और अन्य संगठित अपराधों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि आधुनिक तकनीक, स्थानीय सूचना नेटवर्क और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। फिलहाल लगातार सामने आ रहे मामलों ने हरिद्वार पुलिस की कार्यशैली और खुफिया तंत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

